सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त समिति ने तीनों कृषि कानूनों को बताया फायदेमंद,पक्ष में थे 85% किसान संगठन,किसानों ने आमदनी बढ़ाने का मौका गवाया

by | Mar 22, 2022 | उत्तर प्रदेश, गुजरात, देश/विदेश, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान

रिपोर्ट सार्वजनिक करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को 3 बार पत्र लिखा पर नही मिला जवाब
● कृषि कानून रद्द होने से ज्यादातर संघठनो ने जताई निराशा
● देश के सिर्फ 13.3 प्रतिशत किसान संघठन ही कानून के विरोध में थे
● आंदोलन करने वाले 40 किसान संघठनो ने विरोध का कारण तक नही बताया
● कृषि कानून रद्द होने से किसानों ने आमदनी बढ़ाने का बड़ा मौका गवाया

कृषि कानून के विरोध की पढ़े पूरी इनसाइड रिपोर्ट

देश मे जिन तीन कृषि सुधार कानूनों के विरोध में दिल्ली की घेराबंदी कर कुछ संगठन सालभर तक धरने पर बैठे रहे, 85 प्रतिशत किसान संगठन उन कानूनों को रद करने के पक्ष में नहीं थे।
कृषि कानूनों की समीक्षा करने और उस पर सभी पक्षों की राय जानने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति के एक सदस्य का कहना है कि समिति भी कानूनों को पूरी तरह से रद करने के पक्ष में नहीं थी और उसमें सुधार के लिए कुछ सुझाव दिए थे, जिसमें विशेष कीमत पर फसलों की खरीद राज्यों पर छोड़ने और आवश्यक वस्तु अधिनियम को रद करना शामिल था।

कृषि कानूनों को रद करने पर ज्यादातर संगठनों ने निराशा जताई

तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट जारी करते हुए उसके एक सदस्य और पुणे के जानेमाने किसान नेता अनिल घनवट ने कहा कि कानूनों को रद किए जाने पर ज्यादातर किसान संगठनों ने निराशा जताई है। उन्होंने रिपोर्ट सार्वजनिक करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को तीन बार पत्र लिखा था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलने का बाद वह स्वयं इसे जारी कर रहे हैं। रिपोर्ट जारी करते समय प्रेस कांफ्रेंस में समिति दो अन्य सदस्य कृषि अर्थशास्त्री व कृषि लागत व मूल्य आयोग के पूर्व चेयरमैन अशोक गुलाटी और इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक डा. प्रमोद कुमार जोशी उपस्थित नहीं थे।

MSP पर राज्यों को अधिकार देने की सिफारिश की थी

इस समिति ने तीनों कृषि कानूनों में कुछ सुधार के सुझाव के साथ सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट 19 मार्च, 2021 को सौंपी थी। समिति ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लीगल करने का अधिकार राज्यों को सौंपने की सिफारिश की थी। यह भी कहा था कि MSP को कानूनी रूप देने की किसान संगठनों की मांग तार्किक नहीं है और उसे लागू करना भी मुश्किल है। समिति ने कहा था कि अभी जो 23 फसल एमएसपी के दायरे में हैं ।

आवश्यक वस्तु अधिनियम को खत्म करने की सिफारिश की थी

समिति ने आवश्यक वस्तु अधिनियम को रद करने की सिफारिश करते हुए समिति ने कहा था कि इसके चलते किसानों को हर साल तीन लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है। साथ ही किसानों को सरकारी मंडियों से बाहर निजी कंपनियों को अपने अनाज बेचने की अनुमति देने की राय दी थी।

देश के सिर्फ 13.3 प्रतिशत किसान संगठन ही विरोध में थे

रिपोर्ट के मुताबिक प्रेस कांफ्रेंस में घनवट ने कहा कि उनकी 3.83 करोड़ किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाले 73 किसान संगठनों से सीधी अथवा वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये बात हुई थी। इनमें से 85.7 प्रतिशत यानी 61 संगठनों ने तीनों कानूनों का समर्थन किया था, जिनमें कुल 3.3 करोड़ किसान शामिल थे। मात्र 51 लाख किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाले 13.3 प्रतिशत यानी चार संगठन इसके विरोध में थे। 3.6 लाख किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाले सात संगठन इन कानूनों के कुछ प्रविधानों में संशोधन के पक्षधर थे।

कानून के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले 40 किसान संगठनों ने कोई राय नहीं दी थी

घनवट ने कहा कि इन कानूनों के विरोध में संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के बैनर तले प्रदर्शन करने वाले 40 किसान संगठनों ने अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी थी। उनसे बार-बार अपनी राय या सुझाव देने का आग्रह किया गया था।

नीति निर्माताओं के लिए समिति की रिपोर्ट अहम

घनवट ने कहा कि अब कानूनों को रद कर दिया गया है, इसलिए समिति की सिफारिश का कोई मतलब नहीं रह गया है। परंतु, यह रिपोर्ट कृषि क्षेत्र के नीति निर्माताओं के साथ किसानों के लिए काफी अहम होगी।

सरकारी खरीद सीमित करने की सिफारिश की थी

समिति ने देशभर के लोगों की राय के आधार पर गेहूं व धान की सरकारी खरीद को सीमित करने की सिफारिश की थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की जरूरतों के हिसाब से गेहूं और धान की सरकारी खरीद होनी चाहिए। समिति ने अनाज की खुली खरीद की नीति बंद करने का सुझाव भी दिया है, क्योंकि इससे कुछ राज्यों में अंधाधुंध उत्पादन से पर्यावरण की समस्या पैदा हो रही है। इसके मद्देनजर समिति ने खासकर पंजाब और हरियाणा के लिए विविध फसलों के उत्पादन की नीति तैयार करने को कहा है।

किसानों ने आमदनी बढ़ाने का बहुत बड़ा मौका चूका

शेतकारी संगठन के नेता घनवट ने कहा कि इन कानूनों के रद होने से उत्तर भारत के किसानों अपनी आमदनी बढ़ाने का अवसर गवां चुके हैं। कानून वापसी के लिए सरकार पर दबाव बनाने का उनका फैसला उनके ऊपर ही भारी पड़ेगा। घनवट ने कृषि सुधारों के लिए अक्टूबर में दिल्ली में किसान रैली करने की बात भी कही है।

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