D-Mart सहित कई रिटेलर्स धड़ल्ले से बेचते है अपने विज्ञापन वाला कैरी बैग …. पैसे चुकाने से पहले पढ़ लीजिए ये नियम, आंखें खुल जाएंगी !

by | Feb 13, 2022 | देश/विदेश

अधिकतर छोटी दुकानों में आपको कैरी बैग (Carry bag charges) के पैसे नही देने होते हैं. पर आप डिमॉर्ट व अन्य बड़े मॉल में जाते हो बेग का पैसा वसूला जाता हैं. ग्राहकों (Customer) का कहना है कि जो दुकान सामान बेच रही है, उसे ले जाने के लिए थैला भी दुकान को ही देना चाहिए. यहां तक कि एक ग्राहक ने तो उपभोक्ता फोरम में सेल्स ऑफ गुड्स एक्ट 1930 का हवाला देते हुए शिकायत भी की थी कि सामान को डिलीवर करने की स्थिति में देना दुकान की जिम्मेदारी होती है. वहीं कुछ लोगों का तर्क ये भी है कि जब बैग पर कंपनी अपना विज्ञापन कर रही है तो फिर उसके लिए ग्राहक से पैसे क्यों ले रही है? यहां सबसे बड़ा सवाल तो ये उठता है कि आखिर सही कौन है? थैला बेचने पर उपभोक्ता फोरम ने बिग बाजार (Big Bazaar) और डोमिनोज (Dominos) जैसे रिटेलर्स पर जुर्माना क्यों लगा दिया? तो फिर कैरी बैग को लेकर नियम-कानून (Rules about Carry Bags) क्या कहते हैं?

26 सितंबर 2021 को एक उपभोक्ता अदालत ने ग्राहक को सामान डालने के लिए कैरी बैग नहीं देने पर एक बड़े स्टोर को सात हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। यही नहीं कोर्ट ने आदेश में कहा कि कैरी बैग के दाम और उसके ब्याज सहित यह राशि का भुगतान करना होगा। उसे अदालती खर्च भी देना होगा। अदालत ने यह भी कहा है कि पैसे लेकर कैरी बैग देना बंद करना होगा।

देशभर में कई अन्य रिटेलर्स पर कैरी बैग के लिए पैसे लेने पर जुर्माना लगाया गया. हालांकि, बहुत से रिटेलर्स ने उपभोक्ता फोरम के फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में शिकायत की है, लेकिन सवाल ये है कि आखिर नियम है क्या?

कैरी बैग के लिए पैसे लेने की शुरुआत हुई प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग रूल्स, 2011 के आने के बाद. सरकार का मकसद था कि प्लास्टिक मैनेजमेंट किया जाए. इसके तहत किसी भी ग्राहक को रिटेलर की तरफ से कैरी बैग मुफ्त में मुहैया नहीं कराने का प्रावधान किया गया. ऐसा सिर्फ इसलिए किया गया ताकि ग्राहक प्लास्टिक का इस्तेमाल कम से कम करें और अपने घर से कैरी बैग लाएं. जो लोग फिर भी प्लास्टिक का बैग लेते हैं, उनसे पैसे लिए जाएंगे जो प्लास्टिक मैनेजमेंट में काम आएगा. दिलचस्प ये है कि इस नियम में कैरी बैग को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि यह प्लास्टिक का कैरी बैग होना चाहिए. लेकिन रिटेलर्स ने इस नियम का दुरुपयोग किया और उन्होंने कागज और कपड़े के बैग भी मुफ्त में देना बंद कर दिया और ग्राहकों से पैसे लेने शुरू कर दिए.

आगे चलकर ये पाया गया कि कैरी बैग की न्यूनतम कीमत कितनी होनी चाहिए, ये तय नहीं किया गया है. पैसे कैसे म्यूनिसिपल अथॉरिटी को ट्रांसफर होंगे, ये भी नहीं बताया गया था. ऐसे में 2011 के नियम को 2016 में बदल दिया गया. इसके तहत तय हुआ कि प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट के लिए रिटेलर से पैसे रजिस्ट्रेशन के समय ही ले लिए जाएंगे. मार्च 2018 में 2016 वाले नियम को भी बदल दिया गया और कैरी बैग के लिए ग्राहकों से पैसे लेने वाला नियम ही खत्म कर दिया गया. यानी किसी भी रिटेलर को कागज के या कपड़े के कैरी बैग के लिए पैसे लेने की अनुमति तो पहले ही नहीं थी, अब प्लास्टिक के कैरी बैग के लिए भी पैसे नहीं ले सकते थे. हां, वो बात अलग है कि अब कोई रिटेलर प्लास्टिक का बैग मुफ्त में भी नहीं दे सकता, वरना जुर्माना लगना तय है.

एक शख्स ने सेल्स ऑफ गुड्स एक्ट 1930 के सेक्शन 36 के सब सेक्शन (5) के आधार पर अपनी शिकायत की थी. इस नियम के अनुसार किसी भी प्रोडक्ट को डिलीवरी देने की स्थिति तक लाने में जितना भी खर्चा होता है, वह दुकानदार को ही वहन करना होता है. अब किसी सामान को कोई व्यक्ति यूं ही तो हाथ में टांग कर ले जा नहीं सकता, तो कैसी बैग भी डिलीवरी की स्थिति तक लाने में ही शामिल है, इसलिए इसका खर्चा कंपनी को ही उठाना होता है.

कैरी बैग को रिटेलर्स ने रेवेन्यू मॉडल बना लिया है

एक बैग के 10-15 रुपए, जिसकी कीमत 5 रुपए भी नहीं होती है और डिमॉर्ट जैसी बड़ी पूरे दिन में ऐसे हजारों बैग तो बेच ही देती है. यानी पैसा जोड़ने जाए तो मुनाफा ही मुनाफा. आखिर इससे तगड़ा मुनाफा कौन से धंधे में मिलेगा? तो रिटेलर्स ने इसे ही अपना रेवेन्यू मॉडल बना लिया. अब नियमों को ताक पर रखकर रिटेलर्स कागज और कपड़े के बैग भी बेच रहे हैं. इतना ही नहीं, ये रिटेलर्स इन बैग पर अपना ब्रांड प्रमोशन भी कर रहे हैं. रिटेलर्स धड़ल्ले से कपड़े के बैग बेच रहे हैं, लेकिन कंज्यूमर फोरम की ओर से एक के बाद एक कई रिटेलर्स पर जुर्माना लग चुका है. ना जाने ऐसे ही कितने के पेंडिंग होंगे. खैर, भले ही रिटेलर्स ने कैरी बैग बेचने को अपने बिजनेस मॉडल का हिस्सा बना लिया है, लेकिन ये पूरी तरह से गैर कानूनी है.

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